Angad Ravan Samvad: जब अंगद ने रावण के अहंकार को ललकारा

रामायण की कथा में ऐसे कई प्रसंग हैं जो हमें साहस और कूटनीति की सीख देते हैं, लेकिन angad ravan samvad (अंगद-रावण संवाद) का स्थान सबसे विशिष्ट है। यह वह क्षण था जब युद्ध से ठीक पहले शांति का आखिरी प्रयास किया गया था। इस संवाद में न केवल वीर रस का प्रवाह है, बल्कि यह बुद्धि और तर्कों की एक महान लड़ाई भी है।

🔥 शांति दूत बनकर लंका पहुँचे अंगद | Angad as a Peace Messenger

हनुमान जी द्वारा लंका दहन के बाद रावण के मन में भय तो था, लेकिन उसका अहंकार अभी भी चरम पर था। भगवान श्री राम ने युद्ध टालने और निर्दोषों की जान बचाने के लिए एक अंतिम अवसर देने का निर्णय लिया। इस कार्य के लिए उन्होंने बाली पुत्र अंगद को अपना दूत चुनकर रावण की सभा में भेजा।

अंगद जब रावण की सभा में पहुँचे, तो उन्होंने अपनी शक्ति और तेज से सभी को चकित कर दिया। बिना डरे, वे सीधे रावण के सामने जा खड़े हुए।

🗣️ संवाद: तर्क और साहस का युद्ध | The Dialogue of Wit and Valer

angad ravan samvad की शुरुआत रावण के उपहास से हुई। रावण ने अंगद को ‘बाली का पुत्र’ पहचानते ही उसे अपने पक्ष में करने का प्रयास किया।

  • रावण की चाल: रावण ने अंगद से कहा कि राम ने तुम्हारे पिता बाली का वध किया है, इसलिए तुम्हें राम का साथ छोड़कर मेरे साथ मिल जाना चाहिए।
  • अंगद का करारा जवाब: अंगद ने बड़े धैर्य के साथ कहा, “रावण, तुम मेरे पिता के मित्र होने का ढोंग कर रहे हो, लेकिन सत्य तो यह है कि तुम अपनी मृत्यु के निकट हो। प्रभु श्री राम की शरण में आ जाओ, वरना लंका का विनाश निश्चित है।”

अंगद ने रावण को बार-बार याद दिलाया कि जिस सीता का उसने अपहरण किया है, वह साक्षात जगतजननी हैं और राम साक्षात नारायण।

🦶 अंगद का पैर और रावण की हार | The Challenge of Angad’s Foot

जब रावण ने अंगद की बातों का मजाक उड़ाया और श्री राम की शक्ति को कमतर बताया, तब अंगद ने भरी सभा में एक ऐसी चुनौती दी जिसने सबका अहंकार चूर-चूर कर दिया।

अंगद ने अपना पैर सभा के बीचों-बीच जमा दिया और कहा:

“यदि इस सभा में बैठा कोई भी वीर मेरा पैर भूमि से उठा दे, तो प्रभु श्री राम लंका से बिना युद्ध किए वापस लौट जाएंगे और मैं हार स्वीकार कर लूँगा।”

  • योद्धाओं की असफलता: रावण की सभा के एक-से-एक महारथी आए, मेघनाद जैसे वीर उठे, लेकिन कोई भी अंगद का पैर हिला तक नहीं पाया।
  • जब रावण खुद उठा: अंत में, जब कोई नहीं जीता, तो खुद रावण अंगद का पैर पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। जैसे ही वह झुका, अंगद ने अपना पैर हटा लिया और कहा— “अरे मूर्ख! मेरा पैर क्यों पकड़ता है? पकड़ना है तो मेरे प्रभु श्री राम के चरण पकड़, वही तुझे मोक्ष और जीवन दे सकते हैं।”

इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि जहाँ धर्म होता है, वहाँ शक्ति स्वयं निवास करती है।

💡 Angad Ravan Samvad से मिलने वाली सीख | Key Lessons

  1. अडिग विश्वास: अंगद का जमा हुआ पैर केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि अपने प्रभु के प्रति उनके ‘अडिग विश्वास’ का प्रतीक था।
  2. भयमुक्त कूटनीति: शत्रु के घर में रहकर भी सत्य बोलना और अपनी बात पर टिके रहना एक महान दूत के लक्षण हैं।
  3. अहंकार का पतन: रावण का खुद झुकना यह दर्शाता है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्य के सामने उसे नतमस्तक होना ही पड़ता है।

✨ निष्कर्ष (Conclusion)

angad ravan samvad रामायण का वह प्रेरणादायक अध्याय है जो हमें सिखाता है कि जब हम धर्म के मार्ग पर होते हैं, तो पूरी दुनिया की शक्ति मिलकर भी हमें हिला नहीं सकती। अंगद ने अपनी बुद्धि और वीरता से रावण को युद्ध से पहले ही मानसिक रूप से पराजित कर दिया था।


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