Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति – धर्म, नीति और श्रीराम की शरण में आने की अमर कथा

Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति रामायण की उन घटनाओं में से है, जहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म, कुल और शक्ति से बड़ा होता है। यह कथा केवल एक राक्षस के शरण में आने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साहस, विवेक और नीति का उदाहरण है, जहाँ सत्य के लिए अपने ही परिवार का त्याग करना पड़ता है।

लंका, जो उस समय अपार शक्ति और वैभव का प्रतीक थी, वहाँ भी एक ऐसा व्यक्ति था जिसका हृदय अधर्म से विद्रोह कर चुका था। वह व्यक्ति था – विभीषण।


विभीषण कौन थे?

विभीषण, लंकापति रावण के छोटे भाई थे। जहाँ रावण अहंकार, शक्ति और अधर्म का प्रतीक था, वहीं विभीषण धर्म, नीति और विवेक का स्वरूप थे।

वे प्रतिदिन:

  • श्रीहरि का स्मरण करते
  • धर्मशास्त्रों का पालन करते
  • अन्याय का विरोध करते

राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद उनका मन सदा धर्म की ओर झुका रहा।


सीता हरण के बाद विभीषण का विरोध

जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तभी से विभीषण का हृदय व्यथित हो उठा। उन्होंने रावण को कई बार समझाया कि:

  • यह कार्य अधर्म है
  • यह विनाश का कारण बनेगा
  • श्रीराम नारायण के अवतार हैं

परंतु अहंकार में डूबे रावण ने विभीषण की बातों को अपमान समझा।


रावण और विभीषण के बीच तीखा संवाद

दरबार में विभीषण ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

“परनारी माता समान होती है।”

यह सुनकर रावण क्रोधित हो उठा। उसने विभीषण को:

  • कायर कहा
  • शत्रु का पक्षधर बताया
  • लंका से निकाल देने की धमकी दी

यही वह क्षण था जब Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति की नींव पड़ी।


लंका त्यागने का कठिन निर्णय

विभीषण जानते थे कि सत्य का मार्ग कठिन होता है। उन्होंने अपने पुत्र, पत्नी, वैभव और राज्य – सबका त्याग करने का निर्णय लिया।

चार राक्षस उनके साथ थे:

  • अनल
  • पनस
  • संपाति
  • प्रहस्त

इन सबने मिलकर धर्म की रक्षा के लिए लंका छोड़ दी।


श्रीराम की ओर प्रस्थान

समुद्र पार कर जब विभीषण श्रीराम के शिविर पहुँचे, तब उन्होंने हाथ जोड़कर कहा:

“मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरी रक्षा करें।”

यही क्षण Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति का सबसे पवित्र बिंदु है।


वानर सेना का संशय

विभीषण को देखकर वानर सेना में संदेह उत्पन्न हुआ।
सुग्रीव, जामवंत और अन्य वानरों ने कहा:

  • यह रावण का जासूस हो सकता है
  • यह छल से आया है

सुग्रीव ने श्रीराम से निवेदन किया कि विभीषण को स्वीकार न किया जाए।


श्रीराम का ऐतिहासिक निर्णय

श्रीराम ने तब वह वचन कहा जो युगों तक अमर हो गया:

“जो भी प्राणी एक बार भी मेरी शरण में आता है, मैं उसे कभी त्यागता नहीं।”

यही नीति Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति को रामायण की सबसे महान घटनाओं में स्थापित करती है।


शरणागत वत्सल श्रीराम

श्रीराम ने विभीषण को न केवल शरण दी, बल्कि उन्हें:

  • लंका का भावी राजा घोषित किया
  • धर्म की रक्षा का दायित्व सौंपा
  • सम्मान और स्नेह प्रदान किया

यह दिखाता है कि श्रीराम जाति, कुल या रूप नहीं, केवल भाव और धर्म देखते हैं।


विभीषण का राज्याभिषेक (पूर्व संकेत)

लंका युद्ध से पहले ही श्रीराम ने विभीषण का राज्याभिषेक किया।
यह संदेश था कि:

  • अधर्म का अंत निश्चित है
  • धर्म की विजय पहले से तय है

Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति केवल शरण नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना थी।


विभीषण की भूमिका लंका युद्ध में

विभीषण ने:

  • रावण की शक्तियों के रहस्य बताए
  • मेघनाद और कुंभकर्ण की रणनीतियाँ समझाईं
  • युद्ध में धर्म का साथ दिया

परंतु उन्होंने कभी भी निजी प्रतिशोध नहीं रखा।


विभीषण बनाम रावण: नीति बनाम अहंकार

यह कथा दिखाती है:

  • रावण – शक्ति होते हुए भी पतन की ओर
  • विभीषण – त्याग के कारण उन्नति की ओर

धर्म का मार्ग कठिन होता है, परंतु वही अमर बनाता है।


आज के युग में विभीषण शरणागति की सीख

Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति आज भी हमें सिखाती है:

  • सत्य के लिए अकेले खड़े होना
  • गलत के विरुद्ध बोलने का साहस
  • सही नेतृत्व की शरण लेना
  • धर्म के लिए त्याग करना

यह कथा आज के समाज, राजनीति और व्यक्तिगत जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक है।


क्या विभीषण गद्दार थे?

नहीं।
विभीषण ने:

  • देश नहीं छोड़ा
  • धर्म का पक्ष लिया
  • अधर्म का विरोध किया

जो अधर्म का साथ छोड़ता है, वह गद्दार नहीं – धर्मात्मा होता है।


विभीषण: राक्षस नहीं, धर्मात्मा

रामायण यह सिखाती है कि:

  • जन्म से नहीं
  • कर्म से पहचान बनती है

विभीषण इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं।


निष्कर्ष: शरण में आने वाला कभी त्यागा नहीं जाता

Vibhishan Sharnagati | विभीषण शरणागति केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सिद्धांत है।

श्रीराम का यह वचन आज भी उतना ही सशक्त है:

“जो मेरी शरण में आता है, मैं उसकी रक्षा करता हूँ।”

यही रामायण का हृदय है।

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